मौन का नक्शा – एक युवा की आंतरिक गूंज | शून्यता से प्रकाश तक – अध्याय 5 | रहस्यमयी पंक्तियाँ
अर्दा ने बहुत कम उम्र में भीड़ में अकेला रहना सीख लिया था। घर में सब मौजूद थे, लेकिन कोई वास्तव में एक-दूसरे से जुड़ा नहीं था। पिता थके हुए लौटते, माँ चुपचाप खाना परोसतीं, और छोटा भाई एमिर अपने खिलौनों की दुनिया में खोया रहता। बातचीत संक्षिप्त होती, निगाहें थकी हुई। उस घर में शब्द नहीं, मौन गूंजता था। और अर्दा उसी मौन के बीच बड़ा हो रहा था।
एक शाम, खाने की मेज़ पर पिता ने टीवी चालू किया। समाचारों में युवाओं की "बिगड़ैलता" पर चर्चा हो रही थी। पिता बोले, "ये सब सोशल मीडिया की वजह से है। हर कोई खुद को कुछ समझने लगा है।" अर्दा ने कांटा नीचे रखा। बोला, "शायद हर कोई कुछ है।" मौन छा गया। माँ ने नज़रें झुका लीं। एमिर चुपचाप अपनी थाली में चावल गिनता रहा। पिता बस टीवी देखते रहे। उसी पल अर्दा ने महसूस किया कि इस घर की सबसे ऊँची आवाज़ मौन है।
वह अपने कमरे में चला गया। खिड़की से बाहर देखा। सामने की बालकनी में एक बच्चा अकेला बैठा था। हाथ में मोबाइल, आँखों में खालीपन… अर्दा को लगा वह बच्चा वही है। क्योंकि अकेलापन सिर्फ किसी के न होने का नाम नहीं है। अकेलापन तब होता है जब कहने को बहुत कुछ हो, लेकिन सुनने वाला कोई न हो।
उस रात, उसने अपनी डायरी में एक वाक्य लिखा: “अकेलापन जितना जमा होता है, उतना भारी हो जाता है। और हम अदृश्य बोझ के साथ चलते हैं।” यह उसके भीतर के भावों की पहली अभिव्यक्ति थी। अब उसे सिर्फ व्यवस्था से नहीं, अपने भीतर के मौन से भी सामना करना था। क्योंकि कभी-कभी सबसे ऊँची दीवारें हमारे अपने घरों में खड़ी होती हैं।
अगले दिन, अर्दा ने अपने प्लेटफ़ॉर्म पर एक नया विषय शुरू किया: “अकेलापन संजोने वाले।” उसने बस एक पंक्ति लिखी: “वह भावना यहाँ छोड़ दें, जिसे आप कभी किसी से कह नहीं पाए।” पहले कुछ घंटे मौन रहे। फिर एक संदेश आया: “मैं माँ के साथ एक ही घर में हूँ, लेकिन तीन दिन से बात नहीं हुई।” फिर एक और: “पापा के साथ एक ही कमरे में रहता हूँ, लेकिन हम अजनबी हैं।” और फिर शब्द बहने लगे—एक नदी की तरह। हर एक संदेश किसी और की तन्हाई की गूंज था।
अर्दा ने महसूस किया कि उसका अकेलापन सिर्फ उसका नहीं था। यह एक पूरी पीढ़ी की साझा चुप्पी थी। हर कोई कुछ न कुछ संजो रहा था: अनकहे जज़्बात, दबे हुए ग़ुस्से, अनदेखी उपलब्धियाँ, अनसुनी पुकारें… और यह सब भीतर ही भीतर युवाओं को खोखला कर रहा था।
एक युवा ने लिखा: “मेरे कमरे में इंटरनेट नहीं है। लेकिन अकेलापन हर जगह फुल सिग्नल देता है।” यह पंक्ति अर्दा के दिल में उतर गई। क्योंकि अकेलापन नेटवर्क से नहीं, जुड़ाव से जुड़ा होता है। और कभी-कभी सबसे मजबूत कनेक्शन एक अनजान की समझदारी होती है।
अर्दा ने उस विषय को एक संग्रह में बदल दिया। उसने एक पेज बनाया: “मौन का नक्शा।” उसने तुर्की के विभिन्न शहरों से आए संदेशों को नक्शे पर चिन्हित किया। हर बिंदु एक मौन की आवाज़ बन गया।
ज़ैनब ने जब यह नक्शा देखा, तो उसने लिखा: “यह तो एक देश की आंतरिक आवाज़ जैसा लगता है।” अर्दा ने उत्तर दिया: “और जब तक हम इसे सुनने से इनकार करते रहेंगे, युवा भीतर से सड़ते रहेंगे।” दोनों चुप हो गए। कुछ सच्चाइयाँ सिर्फ मौन में समझी जाती हैं। और कुछ नक्शे रास्ते नहीं, ज़ख्म दिखाते हैं।
जब अर्दा ने नक्शा पूरा किया, तो उसने देखा कि सबसे ज़्यादा चिन्ह उसी शहर में थे जहाँ वह रहता था। यह कोई संयोग नहीं था। यह एक आंतरिक पुकार की गूंज थी। उसने तय किया कि वह अब अपने घर को फिर से देखेगा—इस बार सिर्फ आँखों से नहीं, दिल से भी।
एक शाम, खाने की मेज़ पर फिर वही चुप्पी थी। टीवी चालू था। समाचारों में महंगाई की बातें हो रही थीं। पिता ने गहरी साँस ली। माँ ने चुपचाप चाय डाली। अर्दा ने कांटा नीचे रखा। “पापा,” उसने कहा। “क्या आप मुझसे बात करेंगे?” पिता ने सिर उठाया। “क्या हुआ?” अर्दा बोला: “मैं कभी-कभी बहुत अकेला महसूस करता हूँ। और इस घर में किसी से बात नहीं कर पाता।” मेज़ पर सन्नाटा छा गया। समय थम गया। सिर्फ दिलों की धड़कनें सुनाई दे रही थीं।
माँ ने नज़रें फेर लीं। पिता चुप रहे। लेकिन फिर कुछ अप्रत्याशित हुआ। एमिर बोला: “मैं भी… मैं भी अकेला हूँ भैया।” अर्दा ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखें नम थीं। पिता ने सिर झुका लिया। “मैं भी,” उन्होंने कहा। “लेकिन बात करना भूल गया हूँ।” यह वाक्य घर की दीवारों को तोड़ गया। क्योंकि कभी-कभी किसी घर को फिर से बनाने के लिए पहले मौन को गिराना पड़ता है।
उस रात, अर्दा ने प्लेटफ़ॉर्म पर एक लाइव स्ट्रीम शुरू की। विषय था: “परिवार से बात करना।” सैकड़ों युवा जुड़े। हर किसी ने अपनी कहानी साझा की। किसी ने लिखा कि उसने पहली बार माँ से “मैं तुमसे प्यार करता हूँ” कहा। किसी ने लिखा कि उसने पहली बार पिता को गले लगाया। अर्दा ने महसूस किया: अकेलापन बाँटने से मिटता नहीं, बदलता है। मौन आवाज़ बनता है। बोझ बंधन बनता है। दूरी निकटता में बदलती है।
ज़ैनब ने वह स्ट्रीम देखी। उसने लिखा: “अब तुम सिर्फ एक युवा नहीं हो। तुम एक गूंज हो।” अर्दा ने उत्तर दिया: “मैं तो बस पहली आवाज़ था। असली गीत हम सब मिलकर गा रहे हैं।” और उसी पल, अर्दा के कंधों पर रखा अकेलेपन का बोझ थोड़ा हल्का हो गया। क्योंकि अब वह उसे अकेले नहीं ढो रहा था। और यही असली जीत थी।
अकेलापन मौन में बढ़ता है—लेकिन एक वाक्य से टूटता है। बस कोई कह दे: “मैं भी।”
03 दिसंबर 2025
मेसिमे एलिफ यूनालमिश

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